Friday, October 1, 2010

बापू की व्यावहारिक दृष्टि

एक बार एक प्रोफेसर साहब नाव से नदी पार कर रहे थे। स्वभाव के अनुसार वह नाविक से प्रश्न पर प्रश्न किए जा रहे थे। उन्होंने नाविक से पूछा, भाई कुछ पढ़े-लिखे हो, इस पर नाविक ने कहा, साहब पूरा जीवन तो नाव चलाने में बीत गया। पढ़ाई-लिखाई कब करता। इस पर प्रोफेसर साहब ने कहा, तब तो तुम्हारी जिन्दगी बेकार है। उन्होंने नाविक से पुन: प्रश्न किया, अच्छा यह बताओ कि तुम्हारा विवाह हुआ है। इस पर नाविक ने कहा, साहब पढ़ाई-लिखाई तो कर नहीं पाया। इस वजह से विवाह भी नहीं हो पाया। इस पर प्रोफेसर साहब ने पुन: वही बात दोहराई, तब तो तुम्हारी जिन्दगी बेकार है। इसी बीच नाव डगमगाने लगी। नाविक ने पूछा, साहब तैरना जानते हैं। इस पर प्रोफेसर साहब ने कहा, पूरा जीवन तो पढ़ाई-लिखाई में लगा दिया। तैरना कब सीखता। इस बार नाविक ने कहा, साहब तब तो आपकी जिन्दगी बेकार है। कहने का मतलब यह कि व्यावहारिक ज्ञान के बिना पढ़ाई-लिखाई भी बेकार साबित हो सकती है।
इस सन्दर्भ में महात्मा गांधी की दृष्टि व्यावहारिक थी। उन्होंने कहा था कि वह दुनिया को कोई नई सीख नहीं दे रहे हैं। उनका सत्य और अहिंसा का विचार उतना ही पुराना है, जितना कि पहाड़। उनका मानना था कि सत्य और अहिंसा का वह व्यावहारिक जीवन में अपनी पूरी क्षमता से प्रयोग करना चाहते हैं। शिक्षा के प्रति भी उनका नज़रिया पूरी तरह व्यावहारिक था। उनकी सफलता में उनके व्यावहारिक दृष्टिकोण का बड़ा योगदान रहा है। चरखा और खादी शायद उनके व्यावहारिक दृष्टिकोण की ही उपज थे।
दरअसल, सौ विचार याद किए जा सकते हैं, लेकिन उनमें एक भी समझ में आ जाए, तो वह बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। इसी प्रकार सौ विचारों को समझा जा सकता है, लेकिन उनमें से एक का भी जीवन में प्रयोग बड़ा कठिन होता है। इसी कठिन काम को कर दिखाया था बापू ने। शायद यही था उनके जीवन की सफलताओं का रहस्य भी।

Monday, September 13, 2010

भाषा की भूमिका

मीडिया सूचना का उद्योग है। सूचनाएं भाषा के जरिये आम और खास तक पहुंचती हैं। भाषा जितनी सशक्त होगी, मीडिया का कार्य उतना ही आसान। इस प्रकार मीडिया के लिए भाषा की गुणवत्ता उसके संसाधनों की प्रमुख इकाई है, जो सूचनाओं को प्रसारित करने में परिवहन की भूमिका निभाती है। परिववहन जितन अच्छा होगा, उतनी ही सुगम होगी सूचनाओं की यात्रा। यह भी सच है कि भाषा पर अधिकार पाना सहज नहीं। इस सन्दर्भ में श्रीरामचरितमानस की चौपाई अच्छा संकेत देती है।
श्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी।।
अर्थात-वाणी बिना नेत्र की है और नेत्र के वाणी नहीं है।
इसके बावजूद कुछ छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दिया जाए, तो भाषा को सुगम बनाया जा सकता है। वाक्य छोटे हों तो अधिक आसानी से ग्रहण किए जाते हैं। शब्द सरल हों और उनका उचित प्रयोग किया जाए, तो भाषा सशक्त बनती है। प्रवाह बनाए रखने के लिए वाक्यों का सन्दर्भ एक दूसरे से जुड़ा होना चाहिए। वाक्यों का सम्बंध एक दूसरे से बनाए रखने के लिए अनावश्यक रूप से संयोजक शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। संयोजक शब्दों  का अधिक प्रयोग किया जाता है, तो भाषा जटिल और दुरूह हो जाती है।

Friday, September 3, 2010

स्वागत


आइडिया 4 मीडिया में आपका स्वागत है. यह ब्लॉग उन लोगों को समर्पित है, जो भारी भरकम फीस देकर पत्रकारिता का कोर्स करने में असमर्थ हैं और उनमें पत्रकार बनने की प्रचुर संभावना है. आप भी अपना आइडिया देकर इसे समृद्ध बनाने में सहयोग कर सकते हैं. 
-श्रीकांत सिंह